Monday, 28 October 2013

इस दीपावली के उत्सव पर हमें केवल संकल्प नहीं बल्कि व्यवहार से भी कर के दिखाना है कि हम केवल मिट्टी के दिए जलाये और कुम्हारों और बत्ती बनाने वालों के लिए नयी उम्मीद जगाएं।  इसका दूर गामी असर होंगे।  अगर केवल एक शहर  के लोगों ने भी ये निर्णय सही तरीके से और पूरे निष्ठा से लागू कर दिया तो वो दिन दूर नहीं जब पर्यावरण पर इसका असर दिखाई देने लगेगा और व्यर्थ में मोमबत्ती का धुआं और बची हुयी मोमबत्ती की गन्दगी से भी छुटकारा मिल जायेगा जो कि ज़ल्दी साफ़ नहीं होता और वर्ष दर वर्ष बना रहता है।
दिए से ये लाभ है कि इसकी सफाई ज़ल्दी हो जाती है और बच्चे इससे खेल कर मन भी बहलाते है और यदि कोई दिया टूट गया तो पर्यावरण पर इसका धनात्मक प्रभाव ही पडेगा।  कितने ही परिवारों कि रोजी रोटी की समस्या का समाधान होगा।
 ये मानने में मुझे कोई शंका नहीं है कि लोगों की आदते बदलने में थोडा समय लगेगा और विरोध भी झेलना पड़ सकता परन्तु मेरा मानना है ज्यादातर लोग दिया ही जलाना चाहते है परन्तु इसमें असुविधा समझ कर
मोमबत्ती और बिजली का सहारा लेते है।
मेरा पूर्ण विश्वास है कि अगर हमने दस परिवारों को भी इसके लिए तैयार कर लिया तो दस वर्षों के बाद परिवेश बदला नज़र आएगा।  

Friday, 25 October 2013

आज मेरे एक मित्र  ने सुझाव माँगा कि वो अपनी पुरानी  नौकरी छोड़  यदि अपनी एक गौशाला खोलें तो कैसा व्यवसाय रहेगा ,मैंने उनको सुझाव दिया कि यदि वो अपनी गौशाला में गाय खरीदने के स्थान पर शहर की कुछ घूमती हुई गायों को अपने संरक्षण में ले कर उनकी देखभाल करें और उनके स्वास्थय के सुधर जाने पर
उनसे दूध का वयवसाय का आरम्भ करें तो संभव है कि आप का व्यापार कम पूँजी में भी शुरू हो जाये और केवल गायों के भोजन और औषधि और सही देखभाल से ही कार्य शुरू हो जाये . इससे गायों की भी स्वास्थ्य रक्षा होगी और शहर में भी सफाई रहेगी।  वो मेरी बात सुन कर हंस कर चले गए किन्तु मेरे बात पर यदि उन्होंने ज़रा भी गंभीरता से सोचा और उस पर १% भी कार्य किया तो संभव है कि कुछ नयी शुरुआत हो सके।
वैसे तो  विचार देने वाले की ही पहली ज़िम्मेदारी होती है परन्तु मेरा मित्र शुरुआत करता है तो ये भी एक
अच्छी घटना होगी और संभव है कि उनसे प्रेरणा लेकर और लोग भी इस कार्य में संलग्न हो और मेरे शहर के मुख्य मन्दिरं में भी जहाँ एक वृहद् गौशाला है , वहां भी ये कार्य आरंभ हो और गायों और शहर की तस्वीर बदल जाए



Wednesday, 23 October 2013

apni disha khud tay karen

हम अपने कार्यों को सही दिशा देने के लिए किसी ज्योतिषी या तथा कथित संतों की ओर देखते हैं परन्तु अपने आस पास के लोगों पर हमारी निगाहें क्यों नहीं जाती ,जबकि वे ज्यादा निस्वार्थ भाव से समाज की और देश की सेवा में सलंग्न है।  हम लगभग  रोज़ ही अख़बार में पढ़ते हैं कि कितने ही लोग बिना किसी तत्कालिक स्वार्थ के जंगलों और पर्यावरण की रक्षा के लिए जूझ रहें है और समाज के ठेकेदारों और उनके द्वारा खरीदे हुए प्रशासनिक तंत्र से भी संघर्ष करते हुए जंगलों और नदी नालों और पोखरों की रक्षा कर रहे हैं।  इन्ही में से एक नाम झारखण्ड के सुदूर गाँव की लेडी टार्ज़न जमुना दुदू का भी है।  उन्होंने अपनी सक्रियता और अपने गाँव के महिलाओ की सहायता से कुछ ही वर्षों में ५० एकर भूमि में जंगलों का नया विस्तार किया है। जमुना दुदू के जज्बे और उनके ग्रामवासियों के सहयोग को हमें प्रणाम करना चाहिए और इन तथा कथित मठाधीशों का तिरस्कार करना चाहिए।  जो पैसा और चढ़ावा हम इन्हें दे आते है ,वो पैसा हम अपने आस पास के पर्यावरण को सुधारने और सवारने में लगा कर आर्थिक रूप से भी स्वावलंबी हो सकते हैं।

Tuesday, 22 October 2013

जिस उम्मीद से प्रदेश की जनता ने एक पुरानी पार्टी के नए नौजवानों के आह्वान पर समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत से स्वीकार किया , वह उम्मीद अब टूटती नज़र आ रही है क्योंकि प्रदेश के किसी भी नागरिक को अपनी सुरक्षा का विश्वास नहीं रह गया है।  पूरे प्रदेश में लूट मार और छीना झपटी और हत्याओं और तेजाब फेकने जैसी घटनाओं में भारी बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही हैं।  मुख्यमंत्री को सत्ता सँभालते ही अपराधिक सलामियों की घटनाएँ बढ गयीं है।  प्रदेश की पुलिस अपनी उच्चतम अधिकारी के निर्देशों की खुलेआम अवहेलना कर रही है , जिसकी ताज़ा मिसाल गोरखपुर के दौरे में ही दिख गयी , हर नागरिक ने सोच कर चैन की सांस ली थी कि पुलिस अपने आका के निर्देशानुसार सीमा निर्धारण छोड़ कर पहले समस्या को समझ कर उसके निस्तारण का प्रयास करेगी , परन्तु पुलिस ने एक युवती के शव के पंचनामे को भरने और उसको उठाने में ही कई दिन लगा दिए।  संभव है की सभी घटनाओं की सूचना पुलिस प्रमुख को तत्काल नहीं मिलती परन्तु समाचार पत्रों ने इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया था , जिससे सभी समाचार पढने वाले इसे समझ गए होंगे कि 
प्रदेश में संवेदनशीलता की क्या स्थिति है?

Monday, 21 October 2013

we all are using our Gods statues and idols as our marketing strategic equipments and humbleness and regards are used for show off.All the big pandals and statues are banned for entering others except their organizers and so called donors and priests . They use this chance to oblige their kiths and kins by having
photographs with the statue and use to publish them in their local news paper ,who are some how run for .
advertisement purposes. So in this way paper gets advertisement and organizers get their chance to be advertised for next elections and of their other programmes.