Monday, 30 June 2014

विगत ५ जून को हमने कहानियों पर चर्चा की थी उसी सन्दर्भ में मुझे एक कहानी याद आती है जिसे श्री भीष्म साहनी ने अपने बड़े भाई श्री बलराज साहनी से सुनी थी जिसका शीर्षक है " लिहाफ "
कहानी कुछ इस प्रकार है कि , " जाड़े की एक सर्द रात में एक राही एक सराय में रुकने के लिए अपने घोड़ा गाड़ी से उतरा  और सराय के

Sunday, 15 June 2014

विगत ५ जून को मैंने कहानियों के विषय में चर्चा की थी उसी सन्दर्भ में मैं आज श्री भीष्म साहनी की अपनी अतिप्रिय कहानी की चर्चा करूंगा जिसके बारे में स्वयं भीष्म जी ने कहा है कि ये कहानी उनके बड़े भाई श्री बलराज साहनी जी ने सुनायी थी जिसका शीर्षक  है ,(लिहाफ )
इस कहानी

Tuesday, 10 June 2014


गत कुछ दिवसों में उत्तर प्रदेश और हिमाचल में ऐसी दर्द विदारक घटनाएँ  हुई है कि सारा देश स्तब्ध रह गया है।  एक  घटना सरकार और प्रशासन के निष्क्रियता और भय समाप्त होने से घटित हुई है  , और अभी भी उत्तर प्रदेश की सरकार अपने हाथ कड़े करने के स्थान पर अपने निष्क्रियता को न्यायोचित ठहराने पर तुली है और घटनाएँ बढ़ती ही जा रही है।  इसके पृष्ठभूमि में सबसे बड़ा कारण ये है कि हर अपराधी का कोई न कोई सरकार में या प्रशासन में  सरंक्षक है जो कि उसकी विरादरी से ले कर उसकी पहुंच पर निर्भर करता है। पुलिस का मुखिया घटनाओं को सीमित और परिवर्तित करने के प्रयास करता है और निश्चय ही यह सरकार के कहने पर ही हो रहा है। पुलिस मुखिया के बयान के कुछ घंटो के अंदर ही अपराधियों ने उत्साहित हो कर कुछ और घटनाओं को अंजाम दिया , संभवतः सरकार उस दिन का इंतज़ार कर रही है , जिस दिन जनता स्वयं ही न्याय करने लगेगी  और सरकार का काम समाप्त हो जायेगा। ऐसा ही निर्णय बदायूं के घटना में बेटियों के पिता ने माँगा है जिसमे उन्होंने कहा कि उन्हें मुआवजा नही हत्यारों की फांसी चाहिए।
हिमाचल की घटना तो सरकारी तंत्र के उस विचारधारा को  पोषित करती है,जिसमे जनता को नगण्य समझा जाता है और कोई भी बड़ा परिवर्तन या नया कार्य विशेषकर पानी छोड़ने , नहर नालो की खुदाई करने में आम जनता को कोई भी सार्वजनिक चेतावनी देना सरकार / प्रशासन के प्रतिष्ठा के विपरीत समझा जाता है।  सरकारें ये समझती है कि जनता को देख कर खुद समझ लेना चाहिए और इसीलिये ये घटनाये बढ़ती ही जाती है , जिसमे कुछ घटनाओं का तो पता भी नहीं चलता है।
आखिर हम  कब सुधरेंगे और सरकारों को सही रास्ता दिखाएंगे





Thursday, 5 June 2014


 कहानियां 

आज हम लोग कहानियों के बारे में बाते करेंगे , समाज के निर्माण से लेकर आज तक के आधुनिक काल में भी कहानियों का सृजन और कथन और कथोपकथन निरंतर हो रहा है , समाज के विभिन्न धाराओं और वर्गों को जोड़े रखने के कार्य में कहानियों का अभूतपूर्व योगदान रहा है।  नानी , दादी की कहानियों से लेकर सम्मानित लेखकों , अनगढ़ समाज की कहानियों , प्रत्येक धर्म की कहानियों ने समाज के उत्थान  में महती भूमिका निभायी है।  समाज ने इन कहानियों से बहुत कुछ सीखा और सिखाया है, परन्तु ये सीखना , सिखाना उन्ही लोगो पर कार्य करता है जो उन कहानियों से प्रेरणा लेते है।  यदि कहानियों को सुनकर अनसुना कर दे तो उनका कोई अर्थ नहीं निकलता है और प्रेरणा लेने वाले की ज़िन्दगी बदल देती है.
धार्मिक कहानियों से प्रेरणा ले कर लाखों प्रवासियों  ने राम , कृष्णा का नाम लेते हुए जिंदगी की सारी कठिनाइयों को पार कर लिया , आज भी उन सारे देशों में भारतीयों के सहनशीलता और धार्मिक   अवलम्बन  की कहानियां कही और सुनी जाती है और लोग इनसे प्रेरणा लेते है

कहानी का मूल्य , उसकी  मूल शिक्षा और संवेदना के स्तर से निर्धारित होता है. संवेदना के स्तर पर जो कहानियां श्रेष्ठ होती है उन्ही का प्रभाव समाज पर दीर्घ काल तक सुढृढ़ रहता है।
समाज सदैव ये अपेक्षा रखता है कि उसको दिशा निर्देश देने हेतु कहानियों का सृजन होता रहे और पुरानी कहानियों का भी वाचन भी प्रचलित रहे.