गत कुछ दिवसों में उत्तर प्रदेश और हिमाचल में ऐसी दर्द विदारक घटनाएँ हुई है कि सारा देश स्तब्ध रह गया है। एक घटना सरकार और प्रशासन के निष्क्रियता और भय समाप्त होने से घटित हुई है , और अभी भी उत्तर प्रदेश की सरकार अपने हाथ कड़े करने के स्थान पर अपने निष्क्रियता को न्यायोचित ठहराने पर तुली है और घटनाएँ बढ़ती ही जा रही है। इसके पृष्ठभूमि में सबसे बड़ा कारण ये है कि हर अपराधी का कोई न कोई सरकार में या प्रशासन में सरंक्षक है जो कि उसकी विरादरी से ले कर उसकी पहुंच पर निर्भर करता है। पुलिस का मुखिया घटनाओं को सीमित और परिवर्तित करने के प्रयास करता है और निश्चय ही यह सरकार के कहने पर ही हो रहा है। पुलिस मुखिया के बयान के कुछ घंटो के अंदर ही अपराधियों ने उत्साहित हो कर कुछ और घटनाओं को अंजाम दिया , संभवतः सरकार उस दिन का इंतज़ार कर रही है , जिस दिन जनता स्वयं ही न्याय करने लगेगी और सरकार का काम समाप्त हो जायेगा। ऐसा ही निर्णय बदायूं के घटना में बेटियों के पिता ने माँगा है जिसमे उन्होंने कहा कि उन्हें मुआवजा नही हत्यारों की फांसी चाहिए।
हिमाचल की घटना तो सरकारी तंत्र के उस विचारधारा को पोषित करती है,जिसमे जनता को नगण्य समझा जाता है और कोई भी बड़ा परिवर्तन या नया कार्य विशेषकर पानी छोड़ने , नहर नालो की खुदाई करने में आम जनता को कोई भी सार्वजनिक चेतावनी देना सरकार / प्रशासन के प्रतिष्ठा के विपरीत समझा जाता है। सरकारें ये समझती है कि जनता को देख कर खुद समझ लेना चाहिए और इसीलिये ये घटनाये बढ़ती ही जाती है , जिसमे कुछ घटनाओं का तो पता भी नहीं चलता है।
आखिर हम कब सुधरेंगे और सरकारों को सही रास्ता दिखाएंगे
हिमाचल की घटना तो सरकारी तंत्र के उस विचारधारा को पोषित करती है,जिसमे जनता को नगण्य समझा जाता है और कोई भी बड़ा परिवर्तन या नया कार्य विशेषकर पानी छोड़ने , नहर नालो की खुदाई करने में आम जनता को कोई भी सार्वजनिक चेतावनी देना सरकार / प्रशासन के प्रतिष्ठा के विपरीत समझा जाता है। सरकारें ये समझती है कि जनता को देख कर खुद समझ लेना चाहिए और इसीलिये ये घटनाये बढ़ती ही जाती है , जिसमे कुछ घटनाओं का तो पता भी नहीं चलता है।
आखिर हम कब सुधरेंगे और सरकारों को सही रास्ता दिखाएंगे
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