१० जून की घटना का पटाक्षेप आखिर मुख्यमंत्री जी के हस्तक्षेप से हो गया है, मृतक के परिजनों ने सौदेबाज़ी को स्वीकार कर के न्याय की प्रक्रिया को अवरुद्ध कर दिया। अब ये केस बंद होने के कगार पर पहुँच गया होगा क्यूंकि सारे गवाह और सबूतो का कोई अर्थ नहीं रह गया है। अब सरकार का हर सदस्य कुछ भी कर के पैसे और नौकरी देने के बल पर या अपने जनाधार के बल पर कोई नेता अपने सरकार को बाध्य कर सकता है कि हमारे लिए सौदे बाज़ी करे और सारा सरदर्द अपने सर पर लेकर उनको मुक्त कर दे।
इस प्रक्रिया से ये आधार बन गया है कि सारे निरुद्ध विधायकों और सांसदों को जो किसी भी कारण से जेल में है , उनके लिए भी व्यवस्था कर के उनको भी बाहर ले आए.
मैं ये नहीं जानता कि मंत्री जी कितने दोषी है या नहीं है किन्तु न्याय की प्रक्रिया को अगर चलने दिया जाता और इसके बाद निर्णय होता तो जनता को विश्वास हो जाता कि सरकार न्यायी और समाजकल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।
मृतक के रिश्तेदारों ने भी कुछ विशेष जल्दबाज़ी कर के सौदेबाज़ी को स्वीकार कर लिया और आगे आने वाली ऐसी घटनाओं में होने वाले प्रतिक्रियाओं को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है.
इस प्रक्रिया से ये आधार बन गया है कि सारे निरुद्ध विधायकों और सांसदों को जो किसी भी कारण से जेल में है , उनके लिए भी व्यवस्था कर के उनको भी बाहर ले आए.
मैं ये नहीं जानता कि मंत्री जी कितने दोषी है या नहीं है किन्तु न्याय की प्रक्रिया को अगर चलने दिया जाता और इसके बाद निर्णय होता तो जनता को विश्वास हो जाता कि सरकार न्यायी और समाजकल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।
मृतक के रिश्तेदारों ने भी कुछ विशेष जल्दबाज़ी कर के सौदेबाज़ी को स्वीकार कर लिया और आगे आने वाली ऐसी घटनाओं में होने वाले प्रतिक्रियाओं को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है.
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