Thursday, 5 December 2013

कल मैं अपने निजी कार्यों से विश्व  प्रसिद्ध वाराणसी गया , जो कि देवादिदेव महादेव  का प्रिय नगर भी है ,
और आज भी वहाँ के निवासी इस बात पर गर्व करते हैं कि ये भोलेनाथ की नगरी है और बाबा के त्रिशूल पर ही बसा है।
किन्तु आज इस शहर की दयनीय स्थिति देख कर लगता है कि ,  शायद महादेव ये नगर भूल गए या लोग ये भूल गए कि कभी ये महादेव का ही नगर था , इतनी भयानक गन्दगी और खौफ नाक सड़के देख कर लगता है कि या तो प्रशासन यहाँ है ही नहीं या सोता हुआ एक भयानक सा राक्षस है जिसे लोगों से कर वसूलना तो याद है , परन्तु ये भूल गया कि उसका कोई दायित्व भी है।  सारे रास्तों और चौराहों और नालियों में भयानक गन्दगी जमा है , सारी सड़के और गलियां बुरी तरह टूटी हुई है।  सड़क पर कोई लगातार एक घंटा भी दोपहिया या रिक्शॉ से चलता रहे तो एक सप्ताह में ही उसके अस्थि तंत्र विकृत हो जायेगा और वो डॉक्टर क साथ ही समय बितायेगा और अपनी मेहनत की सारी कमाई उसको ही समर्पित कर देगा।
यही हाल यहाँ गंगा घाटों और उनके किनारे स्थित मंदिरों की भी दुर्दशा भी विचारणीय है। सारे मंदिरों में महंतों का ही कब्ज़ा है , जो काशी कभी संतों के लिए विख्यात थी वहाँ केवल महंतो और लुटेरो का ही बोल बाल है , इसमें सारा दोष नगर वासियो  का ही है क्योंकि वो लोग सारे बुराइयों को बर्दाश्त कर रहे हैं।
मैं  भगवान् से यही प्रार्थना करता हूँ कि वो उन्हें सद्बुद्धि दे और प्रशासन को नींद से जगाये और महंतो और ठगों से इस  दिव्य नगर को बचाएं।




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